Saturday, October 25, 2025

एक यादगार सफर — देवघर से दुमका तक पहली ट्रेन यात्रा

 


एक यादगार सफर — देवघर से दुमका तक पहली ट्रेन यात्रा

12 जुलाई 2011 — यह तारीख मेरे जीवन की यादों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है।
उस दिन पहली बार देवघर से दुमका के लिए ट्रेन चली थी, और इस ऐतिहासिक यात्रा का साक्षी मैं भी बना। आज जब उस दिन को याद करता हूँ, तो मन गर्व और रोमांच से भर उठता है। उस वक्त मैं देवघर कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहा था और वहीं एक लॉज में छात्र जीवन बिता रहा था।
11 जुलाई 2011 की सुबह जैसे ही अख़बार आया, उसमें अगले दिन ट्रेन चलने की घोषणा पढ़ी। खबर पढ़ते ही दिल में उत्साह की लहर दौड़ गई। मैंने तुरंत अपने सभी दोस्तों से कहा-
क्यों न हम भी इस पहली सवारी का आनंद उठाएँ?”
सभी ने उत्साह से हामी भर दी।

अगले दिन सुबह उठने में थोड़ी देर तो हुई, लेकिन उत्साह अपनी जगह कायम था। सुबह करीब छह बजे हम सभी उठ गए। ट्रेन 7:15 में देवघर स्टेशन पर आने वाली थी। हमने 6:30 पर रूम से निकलना तय किया। स्टेशन करीब चार किलोमीटर दूर था। जल्दी पहुँचने की कोशिश में तेजी से पैदल चल रहे थे । रास्ता थकाने वाला था, मगर उत्साह इतना प्रबल था कि थकान की परवाह किसे थी! जैसे ही स्टेशन के पास पहुँचे, देखा कि ट्रेन अभी तक नहीं आई थी, पर वहाँ का माहौल किसी पर्व से कम नहीं था। भाजपा समर्थकों का समूह ढोल-नगाड़ों के साथ ट्रेन का इंतज़ार कर रहा था।
स्टेशन परिसर के बाहर प्रशासनिक अधिकारियों की भीड़ थी।
मैं भी उस जोश में बह गया और भाजपा समर्थकों के जुलूस में शामिल होकर सांसद निशिकांत दुबे और पार्टी के नारे लगाने लगा।

मैं सचमुच नहीं बता सकता कि उस दिन मैं कितना खुश और उत्साहित था। मेरा उत्साह उस वक्त दोहरी वजह से था —
पहली, यह ऐतिहासिक क्षण का हिस्सा बनने का गर्व;
और दूसरी, यह सोचकर कि अब यह ट्रेन दुमका  तक जाएगी — जहाँ Jojo रहती थी, मेरी कॉलेज के दिनों की वह लड़की, जिससे दिल के तार जुड़े थे।

सुबह की पीली धूप पूरे स्टेशन पर बिखरी हुई थी। हर तरफ़ चहल-पहल थी, चेहरे दमक रहे थे और हवा में उम्मीदों की गूंज थी। तभी अचानक दूर से ट्रेन आती हुई दिखाई दी — वह दृश्य मैं आज भी नहीं भूल सकता।
ऐसा लगा मानो स्टेशन के पश्चिमी छोर पर घुमावदार पटरियों के मोड़ से
धरती और आसमान के बीच से ट्रेन निकलता हुवा आ रहा था ।

मेरा उत्साह एक बच्चे की तरह अपने चरम पर पहुँच गया। मैं खुशी से झूमकर दौड़ने लगा, हाथ में भाजपा का झंडा लिए प्लेटफ़ॉर्म के किनारे लहराने लगा। जैसे ही ट्रेन रुकी, लगा जैसे किसी नई दुल्हन का स्वागत हो रहा हो — पूरा ट्रेन फूलों से सजा हुआ था। ड्राइवर, गार्ड, टीटी सभी अपने पूरे रेलवे वर्दी में गर्व से खड़े थे। मीडिया कर्मियों के कैमरे जगह-जगह चमक रहे थे।

उस वक्त कैमरे वाला फोन तो मेरे पास भी था, लेकिन अफसोस — तब इंटरनेट इतना सस्ता आज के Jio की तरह नहीं था। उन दिनों तस्वीरों को सहेज कर रखना उतना सरल भी नहीं था।
उस दिन की तस्वीरें न ले पाने का आज भी अफसोस होता है। काश उस दिन की कुछ तस्वीरें होतीं — तो शायद यह यादें और भी रंगीन होतीं।

स्टेशन पर उपस्थित सभी लोगों ने मिलकर ड्राइवर को बधाई दी, माला पहनाई। लोग अपने-अपने कैमरों से इस नई ट्रेन को अलग-अलग पोज़ में कैद कर रहे थे।

तभी ट्रेन का हॉर्न बजा और धीरे-धीरे ट्रेन आगे बढ़ने लगी। मैं और मेरे सभी दोस्त तीसरे डिब्बे में घुस गए। अंदर का माहौल उल्लास से भरा था। हर कोई इस ऐतिहासिक यात्रा का हिस्सा बनने की खुशी में झूम रहा था।

अभी ट्रेन कुछ दूर ही चली थी कि सोनारायठडी के पास कुछ ग्रामीणों ने इसका रास्ता रोक लिया।
उनकी माँग थी — वहाँ एक हाल्ट स्टेशन बनाया जाए। मैं भी नीचे उतर आया और आगे जाकर देखने लगा। मीडिया कर्मियों ने ग्रामीणों की बातें सुनीं और रेलवे अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया।
थोड़ी ही देर में ट्रेन फिर आगे बढ़ी। उसके बाद मैंने एक ऐसा रोमांचक काम किया, जो शायद आज करने की हिम्मत न होती — मैं वहीं आगे बढ़ा और इंजन पर चढ़ गया। वह पल मेरे लिए जीवन का एक अविस्मरणीय क्षण था। गाड़ी पूरी रफ़्तार में थी। रास्ते में जगह-जगह ग्रामीणों का जमावड़ा लगा था —लोग इस पहली ट्रेन को देखने के लिए उत्सुक थे। मैं इंजन पर खड़ा होकर दूर से हाथ हिलाकर सबका अभिवादन कर रहा था। मेरे लॉज के सभी साथी भी इंजन पर चढ़ आए थे। सभी उत्साह में चिल्ला रहे थे, हँस रहे थे, झूम रहे थे। खेतों में हल चलाते किसान, मवेशी चराते लोग — सभी अपने काम रोककर इस गाड़ी को देख रहे थे। मोहनपुर, घोडमारा, सुंदर पहाड़ी होते हुए गाड़ी 9:20 में बासुकीनाथ  पहुँची।

हम लोगों का कार्यक्रम वहीं तक था। वहाँ उतरकर मैंने एक हसरत भरी निगाह ट्रेन पर डाली।
उसमें चढ़ने वाले लोगों का उत्साह देखकर मैं पुनः उत्साह से भर गया।

बाहर निकलकर हम मंदिर गए। पूजा-पाठ करके करीब 11 बजे लौटे। हम सोच रहे थे कि अब बस से लौटना होगा क्योंकि ट्रेन अपने निर्धारित समय पर जा चुकी होगी।
लेकिन तभी ट्रेन की सीटी की आवाज़ सुनाई दी! हम सब दौड़ते-दौड़ते पुनः बासुकीनाथ स्टेशन पहुँचे और उसी गाड़ी पर चढ़कर वापस अपने लॉज, देवघर लौट आए।

हम सब बहुत थक चुके थे, लेकिन मन में असीम खुशी थी कि इस पहली यात्रा का मैं साक्षी रहा।
काफी थकान के बाद दोपहर के करीब दो बजे हम सब अपने रूम पर पहुँच चुके थे। थके शरीर और प्रसन्न मन के साथ मैं सोच रहा था —
यह दिन मेरे जीवन की सबसे यादगार यात्राओं में से एक रहेगा।”

वह सफर मेरे लिए केवल एक रेल यात्रा नहीं थी — वह मेरे युवावस्था की उमंग, मेरे शहर का गौरव,
और इतिहास के साक्षी बनने का सौभाग्य था। आज भी जब कभी गोड्डा से देवघर जाते वक्त गुजरते हुए उस ट्रेन को देखता हूँ  तो आँखों के सामने वही दृश्य उभर आता है — फूलों से सजा इंजन, पीली धूप में नहाया देवघर स्टेशन, ढोल-नगाड़ों की गूंज, और मैं…........

आज इतने साल बाद भी वह दिन दिल में ताज़ा है।
वह सिर्फ़ एक ट्रेन यात्रा नहीं थी — वह युवा जोश, उम्मीद, और बदलते झारखंड की शुरुआत का प्रतीक था। देवघर से दुमका की पहली ट्रेन भले ही कई लोगों के लिए एक खबर थी,
पर मेरे लिए वह ज़िंदगी की एक ऐसी याद बन गई,
जो समय की रफ़्तार में भी कभी धुंधली नहीं पड़ती।

 

12 जुलाई 2011 — वह दिन,
जो समय के पन्नों पर सदा अमिट रहेगा।

गंगेश गुंजन

महागामा ,गोड्डा

 

Monday, November 11, 2013

मजा बहस में है ..... मंजिल पर पहुँचने में नहीं

हर हिंदी दिवस ,शिक्षक दिवस , पर यह बहस अपने आप जोर पकड़  लेती है की हमारी शिक्षण -व्यवस्था किस भाषा में हो ? अंग्रेजी या हिंदी / बहस का एक लम्बा सिलसिला चल पड़ता है . कई छोटे –बड़े अख़बार लेखक , ब्लॉग लेखक , फेसबूकिया लेखक , शिक्षाविद का चोला पहने छुट –भईया नेता सब कलम घिसने लगते हैं . इस मुद्दे पर / आज 65 साल से बहस इसी मुद्दे पर चल रही है की बच्चो को प्ररंभिक शिक्षा किस भाषा में दी  जाय . मातृभाषा में या अंतररास्ट्रीय भाषा में ?? हम  भारतीयों को बहस –विचार करने में बड़ी आत्मिक सुख की अनुभूति होती है / चाहे वह संसद भवन हो, फेसबुक हो , चाय –पान के दुकान के बाहर लगी बेंच हो , ट्रेन के डब्बे में बैठे  सहयात्री हो , या प्रधानमंत्री जी की भेंट – मुलाकात वार्ता हो या योजना आयोग हो / हर तरफ बहस का लम्बा सिलसिला चल रहा है /
                                    ‘’ मजा विचार –विमर्श करने में है ...........नतीजे पर पहुचने में नहीं ’’ – यह गूढ़ ज्ञान हमें आजादी के वक्त ही मिल गया था और समय के साथ हमारी यह समझ और समृद्ध होती चली गई / हमारी इसी फ़ितरत के कारण हम हर मुद्दे को बड़े जोर –शोर के साथ उठाते है और फिर लम्बी बहस के बाद कट मार लेते हैं /
                                    अब देखये न , ‘’दिल्ली कांड’’ कितने जोर –शोर से  बहस शुरू हुआ फिर आचानक खत्म ,तभी आचानक उपर वाले को उत्तराखंड पर गुस्सा आ गया फिर क्या था अखबारों ने बहस पर इतने पन्ने काले किये की अखबार पढने के लिए ऑफिस से  दो दिन की छुट्टी ले ली , इसी बीच किसी ने फ़िल्मी डायलोग मार दिया की 12 रूपये में आज भी खाना मिलता है फिर एक बहस चल पड़ा और हीरो साहब कट मार लिए , फिर आसाराम ने कारनामा किया और फिर बहस का कारवां चल पड़ा /
                  अब शिक्षक  दिवस नजदीक है तो बहस शिक्षण व्यवस्था पर चल पड़ी है –किसी ने कहा- ‘’शिक्षा अपनी देसी भाषा में होनी चाहिए’’ , तो किसी ने कहा – ‘’बचपन सि ही अंग्रेजी पर ध्यान देने की जरुरत है/’’ बहस चलता रहेगा / बच्चे तो एक पैर ‘’अंग्रेजी रूपी नाव’’ पर तो दूसरी पैर ‘’हिंदी रूपी नाव’’ पर डालकर आगे बढ़ने की कोशिश  करते रहते हैं / हम भी उन्हें दोनों नावों पर चढाने की कोशिश करते रहते हैं ..........आगे हम भी बचपन में पढ़े हैं की दो नावों पर पैर रखने से क्या होता है ?
इसलिये भैया ,बहस चलती रहनी चाहिए और हम तो ऐसा पारंगत हो गये हैं की बहस करते –करते लगा की बोर हो गये तो तुरंत बहस का मुद्दा ही बदल देते हैं और हमारी ‘’सुभास चाय स्टाल’’ , ‘’फेसबुककिया समाज सेवी ग्रुप’’ , ‘’संसद भवन’’ , ‘’गाँव से बाहर वालि पुलिया’’ , ‘’पाणडे जी की आँगन में बैठकी’’ , सब जगह आपनी आदत समृद्ध करते रहते हैं क्योंकि जानते हैं की मजा बहस करने में है ......नतीजे पर पहुचने में नहीं /                                        


                                                                                               गंगेश गुंजन , गोड्डा